सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

प्रदर्शित

आदिकाल की साहित्यिक विशेषताएं

हिन्दी साहित्य के इतिहास में लगभग 8वीं शताब्दी से लेकर 14वीं शताब्दी के मध्य तक का काल ‘आदिकाल’ अथवा ‘वीरगाथाकाल’ नाम से प्रचलित है। ‘आचार्य रामचन्द्र शुक्ल’ ने ‘वीरगाथाकाल’ की समयावधि संवत् 1050 से 1375 तक माना है। इस कालखण्ड में वीरगाथाओं की रचना प्रवृत्ति को प्रधान मानकर आचार्य शुक्ल ने इसे ‘वीरगाथाकाल’ नाम दिया। इस काल के अधिकांश ग्रन्थ संदिग्ध और अप्रामाणिक हैं। इसी कारण द्विवेदी जी ने इसे ‘आदिकाल’ की संज्ञा दी है। आदिकालीन हिन्दी साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत हैं - आश्रयदाताओं की प्रशंसा - आदिकाल में राजा परस्पर युद्धरत रहते थे, उनमें परस्पर वीरता प्रदर्शन हेतु युद्ध होते रहते थे उस समय के प्रायः सभी कवि जो इन राजाओं के दरबारी थे उस समय अपने राजाओं या आश्रयदाताओं की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा करते थे। उदाहरणस्वरूप - पृथ्वीराज रासो, परमाल रासो, कीर्तिलता आदि वीरगाथात्मक प्रवृत्ति से परिपूर्ण हैं। पृथ्वीराज रासो का एक उदाहरण द्रष्टव्य है - “बज्जिय घोर निसान रान चौहान चहूँ दिस। सकल सूर सामंत समरि बल जंब मंत्र तिस।। उठ्ठि राज प्रिथिराज बाग मनो लग्ग वीर नट।” वीर एवं श्रृंगार रस की...

हाल ही की पोस्ट

महादेवी वर्मा के गीतों में अन्तर्निहित वेदना तत्व

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का आलोचनात्मक प्रतिमान

महाकाव्य की उत्पत्ति, विकास एवं विशेषताएं

देवनागरी लिपि की प्रमुख विशेषताएं

किताब

मकबूल फिदा हुसैन की कहानी अपनी जुबानी आत्मकथा के शीर्षक माधुरी और मां अधूरी पर टिप्पणी

नाटक की उत्पत्ति, विकास एवं विशेषताएं

कादम्बरी (मंगलाचरण)